Tuesday, October 28, 2014

सूर्योपासना का महापर्व है छठ

हमारे देशमें सूर्योपासनाके लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ। सूर्य षष्ठी व्रत होनेके कारण इसे छठ कहा गया है। पारिवारिक सुख-स्मृद्धि तथा मनोवांछित फलप्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को स्त्री और पुरुष दोनों मिल कर मनाते हैं। छठ व्रतके संबंध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं; उनमें से एक कथाके अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। तब उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया। लोकपरंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठी मइया का संबंध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्यने ही की थी। यह पर्व चार दिनों का होता है ।
भैयादूज के तीसरे दिन नहाये खाए से यह आरंभ होता है। पहले दिन सेंधा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दूकी सब्जी प्रसाद के रूप में व्रती को दिया जाता है । अगले दिनसे उपवास आरंभ होता है इसे खरना कहते है । इस दिन रात में गन्ने के रस की बखीर बनती है। व्रतधारी पूरे दिन व्रत रखने के बाद रात में देवकुरी के पास भोग लगाने के बाद यह प्रसाद लेते हैं। तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ,जिसे टिकरी या खजूर भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू बनाये जाते हैं। प्रसाद बनाते हुए सभी महिलाएँ छठ मईया के गीत गाती हैं |
निर्धन जानेला ई धनवान जानेला,
महिमा छठ मईया के अपार ई जहां जानेला ||

हम करेली छठ बरतिया से उनखे लागी.........आदि

इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया मौसम के सभी फल जैसे - सेव, केला, नाशपाती,शरीफा,अदरक,मूली,कच्ची हल्दी, नारियल,सुथनी आदि भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है।
शाम को पूरी तैयारी कर बाँस की टोकरी (दौरा)में नयी साड़ी या पीला कपड़ा बिछा कर उसमे ठेकुआ, फल, ऐपन,सभी प्रकार के प्रसाद  और अर्घ्य का सूप सजाया जाता है, व्रती के साथ बड़ी श्रद्धाभाव से दौरा सिर पर रख कर परिवार तथा पड़ोस के लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर गीत गाते हुए चल देते हैं।
*काँच ही बाँस के बहँगिया, बहँगी लचकति जाय |
बात जे पुछेलें बटोहिया, बहँगी केकरा के जाय ?
तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया, बहँगी छठी माई के जाय...*
सभी छठव्रती एक तालाब या नदी किनारे इकट्ठा हो कर नदी या तालाब की मिट्टी से बनायी गई छठ मईया की पिंडी पर ऐपन, लगा कर पीले सिन्दूर से टिकती हैं फिर दिया जला कर सभी फल, फूल, ठेकुआ आदि समर्पित करती हैं और गीत गाती हैं --
*सेविले चरन तोहार हे छठी मइया। महिमा तोहर अपार....*
फिर व्रती घुटनों तक जल में खड़े हो कर सामूहिक रूप से छठी मैया की प्रसाद भरे सूप को ले पूजा कर डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। जो लोग भीड़ के डर से घाट पर नही जाना चाहते वो अपने घर में ही कृत्रिम तालाब का निर्माण करते हैं और उसी को घाट मान उसमे खड़े हो कर सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य देते  हैं | नदी या तालाब के जल में दीपदान भी किया जाता है। इस दौरान कुछ घंटों के लिए घाटों पर मेले सा दृश्य बन जाता है। चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी को अलभोर में ही व्रती उसी नदी या पोखर में घुटनों तक जल में खड़े हो कर सूर्य देव के उदय होने की प्रतीक्षा करते हुए गीत गाती हैं --
निंदिया के मातल सुरुज अँखियो न खोले हे...
उगु न सुरुज देव भइलो अरग के बेर...
और पहली किरण के साथ उदित होते ही सूर्य को अर्घ दिया जाता है। फिर सभी सुहागनों की मांग बहोरी जाती है । अंत में व्रती कच्चे दूध का सरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं।*
छठ पूजा में कोसी भरने की मान्यता है अगर कोई अपने किसी अभीष्ट के लिए छठ मइया से मनौती करता है तो वह पूरी करने के लिए कोसी  भरी जाती है या जब घर में नयी बहू या पुत्र का जन्म होता है तब भी कोसी भरने की परम्परा है | इसके लिए छठ पूजन के साथ-साथ गन्ने के बारह पेड़ से एक समूह बना कर उसके नीचे एक मिट्टी की कोसी (बड़ा घड़ा) जिस पर छ: दिए होते हैं देवकरी में रखे जाते हैं और बाद में इसी प्रक्रिया से नदी किनारे पूजा की जाती है नदी किनारे गन्ने का एक समूह बना कर छत्र बनाया जाता है उसके नीचे पूजा का सारा सामान रखा जाता है। कोसी की इस अवसर पर काफी मान्यता है उसके बारे में एक गीत गाया जाता है जिसमें बताया गया है कि छठ मइया को कोसी कितनी प्यारी है।
रात छठिया मईया गवनै अईली                                                                  
आज छठिया मईया कहवा बिलम्बली
बिलम्बली बिलम्बली कवन राम के अंगना
जोड़ा कोशियवा भरत रहे जहवां,
जोड़ा नारियल धईल रहे जहंवा
उंखिया के खम्बवा गड़ल रहे तहवां*
इस पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है।। आजकल कुछ नई रीतियां भी आरंभ हो गई हैं, जैसे घाटों पर पंडाल और सूर्यदेवता की मूर्ति की स्थापना करना। उसपर भी काफी खर्च होता है और सुबह के अर्घ्यके उपरांत आयोजनकर्ता माईक पर चिल्लाकर प्रसाद मांगते हैं। पटाखे भी जलाए जाते हैं। कहीं-कहीं पर तो ऑर्केस्ट्राका भी आयोजन होता है; परंतु साथ ही साथ दूध, फल, उदबत्ती भी बांटी जाती है। पूजा की तैयारी के लिए लोग मिलकर पूरे रास्ते की सफाई करते हैं।
छठ पूजा का आयोजन आज बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त देश के हर कोने में किया जाता है | मारीशस में यह त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है कलकत्ता,चेन्नई,मुम्बई जैसे महानगरों में भी समुद्र किनारे जन सैलाब दिखाई देता है | प्रशासन को इसके लिए विशेष प्रबंध करने पड़ते हैं | वैज्ञानिक दृष्टि से भी सूर्य की पूजा या जल देना लाभदायक माना जाता है |वैसे तो रोज ही मंत्रोच्चारण के साथ लोग सूर्य को जल अर्पित करते हैं पर इस पूजा का विशेष महत्व है | इस पूजा में व्रतियों को कठिन साधना से गुजरना पड़ता है |

सभी को छठ महा पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ..जय छठी माई की ..

Friday, October 3, 2014

तब होगी बुराई पर अच्छाई की विजय




दशहरा, विजयदशमी या आयुध-पूजा हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है, हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। दशहरे का उत्सव शक्ति और शक्ति का समन्वय बताने वाला उत्सव है। नवरात्रि के नौ दिन जगदम्बा की उपासना करके शक्तिशाली बना हुआ मनुष्य विजय प्राप्ति के लिए तत्पर रहता है।
भगवान राम के समय से यह दिन विजय प्रस्थान का प्रतीक निश्चित है। भगवान राम ने रावण से युद्ध हेतु इसी दिन प्रस्थान किया था। मराठा रत्न शिवाजी ने भी औरंगजेब के विरुद्ध इसी दिन प्रस्थान करके हिन्दू धर्म का रक्षण किया था। भारतीय इतिहास में अनेक उदाहरण हैं जब हिन्दू राजा इस दिन विजय-प्रस्थान करते थे। इस पर्व को भगवती के 'विजया' नाम पर भी 'विजयादशमी' कहते हैं। है। यह भारत का 'राष्ट्रीय त्योहार' है। रामलीला में जगहजगह रावण वध का प्रदर्शन होता है। क्षत्रियों के यहाँ शस्त्र की पूजा होती है। इस दिन नीलकंठ का दर्शन बहुत शुभ माना जाता है। दशहरा या विजया दशमी नवरात्रि के बाद दसवें दिन मनाया जाता है।
देश के कोने-कोने में यह विभिन्न रूपों से मनाया जाता है| हिमाचल प्रदेश में कुल्लू का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है। पहाड़ी लोग अपने ग्रामीण देवता का धूम धाम से जुलूस निकाल कर पूजन करते हैं। देवताओं की मूर्तियों को बहुत ही आकर्षक पालकी में सुंदर ढंग से सजाया जाता है। साथ ही वे अपने मुख्य देवता रघुनाथ जी की भी पूजा करते हैं।
पंजाब में दशहरा नवरात्रि के नौ दिन का उपवास रखकर मनाते हैं। यहां भी रावण-दहन के आयोजन होते हैं, व मैदानों में मेले लगते हैं।बस्तर में दशहरे के मुख्य कारण को राम की रावण पर विजय ना मानकर, लोग इसे मां दंतेश्वरी की आराधना को समर्पित एक पर्व मानते हैं। दंतेश्वरी माता बस्तर अंचल के निवासियों की आराध्य देवी हैं, जो दुर्गा का ही रूप हैं। बंगाल,ओडिशा और असम में यह पर्व दुर्गा पूजा के रूप में ही मनाया जाता है।पूरे बंगाल में यह त्यौहार पांच दिनों के लिए मनाया जाता है।ओडिशा और असम मे चार दिन तक त्योहार चलता है। यहां षष्ठी के दिन दुर्गा देवी का बोधन, आमंत्रण एवं प्राण प्रतिष्ठा आदि का आयोजन किया जाता है। उसके बाद सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी के दिन प्रातः और सायंकाल दुर्गा जी की पूजा होती हैं। अष्टमी के दिन महापूजा और बलि भी दी जाती है। दशमी के दिन विशेष पूजा होती है। प्रसाद चढ़ाया जाता है और प्रसाद वितरण किया जाता है। पुरुष आपस में आलिंगन करते हैं, जिसे कोलाकुली कहते हैं। स्त्रियां देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं, व देवी को अश्रुपूरित विदाई देती हैं। इसके साथ ही वे एक दूसरे को भी सिंदूर लगाती हैं, व सिंदूर से खेलती हैं। इस दिन यहां नीलकंठ पक्षी को देखना बहुत ही शुभ माना जाता है। इसके बाद देवी प्रतिमाओं विसर्जित कर दिया जाता है |
तमिलनाडु
, आंध्रप्रदेश एवं कर्नाटक में दशहरा नौ दिनों तक चलता है जिसमें तीन देवियां लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की पूजा करते हैं। यहां दशहरा बच्चों के लिए शिक्षा या कला संबंधी नया कार्य सीखने के लिए शुभ समय होता है। कर्नाटक में मैसूर का दशहरा विशेष उल्लेखनीय है। मैसूर में दशहरे के समय पूरे शहर की गलियों को रोशनी से सज्जित किया जाता है और हाथियों का श्रींगार कर पूरे शहर में एक भव्य जुलूस निकाला जाता है। इस समय प्रसिद्ध मैसूर महल को दीपमालिकाओं से दुलहन की तरह सजाया जाता है। इन द्रविड़ प्रदेशों में रावण-दहन नहीं किया जाता। गुजरात में मिट्टी सुशोभित रंगीन घड़ा देवी का प्रतीक माना जाता है और इसको कुंवारी लड़कियां सिर पर रखकर एक लोकप्रिय नृत्य करती हैं जिसे गरबा कहा जाता है। गरबा नृत्य इस पर्व की शान है। पुरुष एवं स्त्रियां दो छोटे रंगीन डंडों को संगीत की लय पर आपस में बजाते हुए घूम घूम कर नृत्य करते हैं।
महाराष्ट्र में नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा को समर्पित रहते हैं, जबकि दसवें दिन ज्ञान की देवी सरस्वती की वंदना की जाती है। इस दिन विद्यालय जाने वाले बच्चे अपनी पढ़ाई में आशीर्वाद पाने के लिए मां सरस्वती के तांत्रिक चिह्नों की पूजा करते हैं। महाराष्ट्र के लोग इस दिन विवाह, गृह-प्रवेश एवं नये घर खरीदने का शुभ मुहूर्त समझते हैं।
कश्मीर के अल्पसंख्यक हिन्दू नवरात्रि के पर्व को श्रद्धा से मनाते हैं। परिवार के सभी बड़े सदस्य नौ दिनों तक सिर्फ पानी पीकर उपवास करते हैं। पुरानी परंपरा के अनुसार नौ दिनों तक लोग माता खीर भवानी के दर्शन करने के लिए जाते हैं। यह मंदिर एक झील के बीचोबीच बना हुआ है। कहते हैं कि जब भी कोई घोर विपत्ति आने वाली होती है इस झील का पानी कला हो जाता है |
भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है |
इस दिन के शुभ कृत्य हैं- अपराजिता पूजन, शमी पूजन, सीमोल्लंघन (अपने राज्य या ग्राम की सीमा को लाँघना), घर को पुन: लौट आना एवं घर की स्त्रियों द्वारा अपने समक्ष दीप घुमवाना, नये वस्त्रों एवं आभूषणों को धारण करना, राजाओं के द्वारा घोड़ों, हाथियों एवं सैनिकों का नीराजन तथा परिक्रमणा करना। दशहरा या विजयादशमी सभी जातियों के लोगों के लिए महत्त्वपूर्ण दिन है |
इस दिन
 राम ने रावण का वध किया था। रावण श्री राम की पत्नी सीता का अपहरण कर लंका ले गया था। भगवान राम युद्ध की देवी मां दुर्गा के भक्त थे, उन्होंने युद्ध के दौरान पहले नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा की और दसवें दिन रावण का वध किया। इसलिए विजयादशमी एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण दिन है। इस दिन रावण, उसके भाई कुम्भकर्ण और पुत्र मेघनाथ  के पुतले खुली जगह में जलाए जाते हैं। कलाकार राम, सीता और लक्ष्मण के रूप धारण करते हैं और आग के तीर से इन पुतलों को मारते हैं जो पटाखों से भरे होते हैं। पुतले में आग लगते ही वह धू-धू कर जलने लगता है | यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।
एक रावण का अंत करने के लिए स्वयं भगवान को पृथ्वी पर आना पड़ा था आज तो ना जाने कितने रावणों के बोझ से ये धरा व्याकुल है, ना जाने कितनी सिताएं कैद में कराह रही हैं, कितनी नग्न कर क्षत-विक्षत कर दी जा रही हैं, वृक्षों की डालों पर लटका दी जा रही हैं, तेज़ाब से झुलसा दी जा रही हैं और कितनी सारी गर्भ में ही मार दी जा रही हैं | आइये इस दशहरे को संकल्प लें कि इस रावण दहन के साथ ही हम अपने भीतर के आसुरी प्रवृत्तियों का भी दहन कर के इस धरा को बोझ मुक्त करेंगे, कागज का रावण नही अपने भीतर के रावण का दहन करना होगा तब सही मायने में यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक होगा |

मीना पाठक
कानपुर-उत्तरप्रदेश





Monday, September 15, 2014

एक रचनाकार की मौत



जब से कामिनी को लिखने का शौक चढ़ा वो हमेशा कुछ ना कुछ सोचती रहती हर कहीं उसे कोई कविता या कहानी नजर आने लगी थी | अकेली हो या कोई काम कर रही हो उसका दिमाग कुछ ना कुछ ताने बाने बुनता रहता | रसोई में भी कलम छुपा कर साथ रखती | जब भी कुछ मन में आता वो किसी भी रद्दी कागज पर लिख लिया करती फिर काम खत्म कर के अपने लेपटॉप पर लिखती | इसका उसे लाभ भी हुआ उसकी कलम ने कई कविताएँ और कहानियाँ उगलीं जो पसन्द की गयीं और पत्रिकाओं में भी छपी | धीरे-धीरे वो अपनी पहचान बना रही थी | पर ये सब उसके पति को बिल्कुल पसन्द नही था | यूँ उसका खोये रहना उसके पति को जरा भी नही भाता था | पति को लग रहा था कि वो उसके हिस्से का समय अपने शौक पूरे करने में लगा रही है | वो हर बार उसे उलाहने देते कि
कहाँ खोई रहती हो ? क्या सोचती रहती हो ? किसके बारे में सोचती हो ? कामिनी हर बार कुछ ना कुछ बहाना बना देती |
कामिनी का लिखना और छपना उन्हें तनिक भी नहीं सुहा रहा था | घर का माहौल दिन पर दिन बिगड़ रहा था पर कामिनी अपनी कलम के बिना अब नही रह सकती थी | उसका कहना था कि वो सभी जिम्मेदारियों को निभाते हुए लिखती है न कि अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ कर पर उसके पति को मंजूर नही था वो किसी भी साम-दाम-दण्ड-भेद से उसे आगे बढ़ने से रोकना चाहता था वैसे तो कई बार कामिनी ने अपनी कविताएं और कहानियाँ पति को पढ़वा कर पति से थोड़ी वाहवाही लूटनी चाही पर हर बार उसे
अभी समय नही है कह कर टाल दिया जाता था |
उस दिन जब वो खाना ले कर पति के पास गई तो गोली की तरह एक प्रश्न दाग दिया गया
ये राकेश कौन है ?
कौन राकेश वो चौंक कर बोली |
वही जो तुम्हारी प्रेम कहानी का नायक है, जरूर उससे तुम्हारा शादी से पहले कोई संबंध था जिसको तुमने कहानी का रूप दे दिया है | जहर उगलते हुए उसके पति ने कहा |
कामिनी के पाँव तले जमीन खिसक गई वो कहानी तो मात्र कल्पना थी | उसके पति उससे ऐसा प्रश्न करेंगे ? उसने तो सपने में भी नही सोचा था, वो क्रोध और अपमान से थर-थर काँपने लगी | अपने कमरे में जा कर फूट-फूट कर रो पड़ी | जिसके साथ जीवन का एक बड़ा हिस्सा जिया हो वही आज ऐसा ओछा प्रश्न करेगें ...??
आँसूओं के सैलाब ने सारे शब्दों को बहा कर समंदर में डुबो दिया..वो निराशा से घिर गई उसे लगा अब जीवन में कुछ नही रखा है ..वो ये सब किस लिए कर रही है... उसे खुद के लिए जीने का क्या हक है..वो तो रोटी और कपड़े के बदले बिक चुकी है..वो अपनी इच्छाओं का गला घोंट देगी...अब कभी नही लिखेगी वो ...उसने लैपटॉप ऑन किया और अपनी सारी कहानियाँ और कविताएँ डीलीट कर दी..जिसमे उसकी आत्मा बसती थी..जिनको हर समय वो जीती थी...जो उसकी साँसों में थी...उसकी धड़कन थीं...जिसके बिना वो जीवित नही रह सकती थी.. हाँ...आज अपनी रचनाओं के साथ वो भी मर गई थी..एक रचनाकार की मौत हो गई थी...|



मीना पाठक

 

Thursday, August 14, 2014

स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ

कहने को तो हम १५ अगस्त १९४७ को आजाद हो चुके हैं | हम बड़े धूम धाम से ये दिन मानते हैं इस दिन हम सभी देशभक्त वीर सुपुतों को याद करते हैं |
कहते हैं जिस शक्तिशाली साम्राज्य का सूरज कभी नही डूबता था वो निहत्थे भारतीयों के सामने झुक गये और १५ अगस्त १९५७ के दिन गुलामी की काली  रात समाप्त हुई और हमें आजादी मिली |
सुभाषचंद्र बोस, भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद ने क्रांति की आग फैलाई और अपने प्राणों की आहुति दी। तत्पश्चात सरदार वल्लभभाई पटेल, गांधीजी, सत्य, अहिंसा और बिना हथियारों की लड़ाई लड़ी | सत्याग्रह आंदोलन किए, लाठियां खाईं, कई बार जेल गए और अंग्रेजों को हमारा देश छोड़कर जाने पर मजबूर कर दिया | इस दिन इन सब को हम श्रद्धांजलि देते हैं, इनका आभार प्रकट करते हैं और अपने कर्तव्यों से इति श्री कर लेते हैं फिर वर्ष भर इनकी मूर्तियों पर कौवे बैठें या चील हमें क्या ? पर जिस भारत के लिए इन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगायी क्या हम वो भारत उन्हें दे पाए हैं ?
आज जिस कदर देश में भ्रष्टाचार फैला है, अपने ही अपने देश को लूट कर अपनी तिजोरियां भरने में लगे हैं, विदेशी बैंकों में उनके खजाने भरते जा रहे हैं, गरीब और गरीब और अमीर और अमीर होता जा रहा है | अमीरी-गरीबी की खायी बढ़ती ही जा रही है, क्या इसे कभी पाटा जा सकता है ? स्त्रियों की सुरक्षा हो या कन्या भ्रूण हत्या या आये दिन उन पर अनेकों तरह से किये जा रहे जुल्मों को आज तक खत्म किया जा सका है ? अंग्रेज तो विदेशी थे, पराये थे इस लिए हम पर जुल्म करते थे आज तो हम आजाद हैं और सब अपने, फिर ये जुल्म क्यूँ ? स्त्रियों पर इतने अत्याचार होते हैं, उनकी हत्या से ले कर बलात्कार तक पर जिन्हें अपराधियों को दण्ड दिलाना है वही लीपा पोती कर उन्हें बचा ले जाते हैं | यही आजादी है ?
 आये दिन साम्प्रदायिक दंगे-फसाद....इससे राजनेताओं को तो लाभ होता है पर आम जनता सजा भुगतती है | इसका जिम्मेदार कौन हैं ? और भी बहुत सी समस्याएं हैं किस-किस का जिक्र करूँ |

युवक देश की रीढ़ की हड्डी के समान है | उन्हें देश का गौरव बनाए रखने के लिए तथा इसे संपन्न एवं शक्तिशाली बनाने में अपना योगदान देना चाहिए | राष्ट्र की उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि वो सांप्रदायिकता के विष से सर्वथा दूर रहें |
घूस, जमाखोरी, कालाबाजारी को देश से समाप्त करें | भारत के नागरिक होने के नाते स्वतंत्रता का न तो स्वयं दुरुपयोग करें और न दूसरों को करने दें| एकता की भावना से रहें और अलगाव, आंतरिक कलह से बचें |
हमारे लिए स्वतंत्रता दिवस का बड़ा महत्व है | हमें अच्‍छे कार्य करना है और देश को आगे बढ़ाना है |
दुःख की बात है कि इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी भरत अपने सपने को साकार नही कर सका है इसका कारण वैयक्तिक स्वार्थ कहा जा सकता है या दलबंदी भी एक कारण हो सकता है | एक बात और सरकार के साथ नागरिकों को भी देश के प्रति अपने कर्तव्यों को याद रखना होगा |


आईये ये संकल्प लें कि जिन शहीदों के प्रति श्रद्धा से मस्तक अपने आप ही झुक जाता है जिन्होंने स्वतंत्रता के यज्ञ में अपने प्राणों की आहु‍ति दे कर हमें स्वतंत्रता दिलाई हम उस स्वतंत्रता की रक्षा करेंगे | देश का नाम विश्व में रोशन हो, ऐसा कार्य करेंगें, देश की प्रगति के साधक बनेगें न‍ कि बाधक |
अमर शहीदों को नमन
जय हिन्द
||सभी देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ||

मीना पाठक