आरती की थाली लिए हाथों में जाने कब से निहार रही हूँ बाट .... आएगी वह जब सिमटी लाल-जोड़े में , मेहँदी रचे हाथों से दरवाज़े पर लगा कर हाथों के थाप , ढरकाती हुई अन्न का कलश आलता लगे पैरों से निशान बनाती करेगी प्रवेश मेरी बहू अन्नपूर्णा, मेरे घर में बन के मेरे घर की लक्ष्मी ||