Thursday, July 18, 2013

जल














जल

इस संसार में समस्त जीवों, पशुओं और पौधे सब को पानी की आवश्यकता है | प्राचीन काल में लोगों ने बस्तियाँ कस्बा, नगर, गाँव, नदियों के किनारे ही बसाये थे ताकि वो जो फसल या पेड़ पौधे लगाएं उसको नदियों से पर्याप्त जल मिलता रहे | पर उन्होंने नदियों की ज़मीन नहीं हथियाई, प्रकृति के साथ छेड़छाड़ नही किया |

जल ही जीवन है | पर जब यही जल प्रलय बन के टूट पड़े तो न जाने कितने जीवन लील लेता है | जब ये जल का जलजला आता है तब अपने साथ तबाही और बर्बादी ले कर आता है चारों तरफ़ चीख पुकार ..इधर-उधर भागते हुए लोग और अपनों को अपने सामने ही जल समाधि लेते हुए देख कर भी कुछ ना कर पाने को विवश लोग और जब जाता है तब अपने पीछे छोड़ जाता है लाशों के ढेर, उजड़ी हुई बस्तीयां, नगर और गाँव, रोते बिलखते लोग | बसे बसाये नगर शमशान में तब्दील हों जाते है |
किसी भी चीज की अधिकता विनाशकारी है नदिया जब तक अपनी मर्यादा में बहें तभी तक जल जीवन है पर नदी में जल का उफान आते ही वो अपने किनारों को छोड़ बाहर आ जाती है और तभी आता है जल प्रलय |
अखिर इसका जिम्मेदार कौन है | हमारी एक इंच ज़मीन कोई ले ले तो हम उसे पाने के लिए ना जाने क्या क्या करते हैं पर हमने इन नदियों की कितनी ज़मीन हड़प ली फिर भी ये सब कुछ सहती हुई शांत बहती रही और हमें जीवन देती रही पर आखिर कब तक वो भी कब तक सहती हमने तो अति ही कर दी | उसके सीने पर होटल, मकान से ले कर दूकान तक बना डाले और उसी की ज़मीन पर जम कर पैसे बनने लगे | हम तो अपनी जेबे भरते रहे पर उसके दिल में कितने छेद हुए ये नही देख पाए और जब वो दर्द नहीं सह पायी तब उसने तोड़ दी सारी मर्यादा और गुस्से से उफनाती हुई पूरे हक से अपनी ज़मीन वापस ले ली | उसने तो अपना हक ही लिया जो हमने उससे छीना था | असली दोषी कौन है हम या वो नदी जिसे सिकुड़ने पर हमने मजबूर कर दिया था | आज उसने फैलाव लिया तो सब छिन्न - भिन्न, चीख पुकार, हाहाकार और विनाश के सिवा कुछ भी हाथ नही लगा |
नदियाँ अपनी मर्यादा में रहें इसके लिए हमे खुद मर्यादा में रहना होगा | उनकी ज़मीन पर अवैध निर्माण, ना जाने कितने जल बिद्दुत परियोजनाएं. बाँध और गंदे नालों का पानी उसमे निरने से रोकना होगा | वृक्ष लगाने होंगे जो विकाश के नाम पर कटते जा रहे हैं | अगर हम अपनी सीमाएं नहीं तोड़ेंगे तो नदियां भी अपनी सीमा में ही बहेंगी | प्रकृति हमें देती है हम से कुछ लेती नही, हम ही प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते हैं और उसका खामियाजा खुद ही भुगतते हैं और सारा दोष प्रकृति के सिर मढ़ देते हैं | अलखनंदा व मंदाकिनी ने अपना रौद्र रूप दिखा कर हमें सचेत किया है, हम अब भी ना चेते तो भगवान ही मालिक है |

||मीना पाठक||

चित्र - गूगल  

Tuesday, July 9, 2013

चाह बस् इतना कि
















चाह नही मुझे कि..
मिलूँ तुमसे बागों व बहारों में

चाह नही मुझे कि..
मिलूँ तुमसे नदी के किनारों पे

चाह नही मुझे कि..
तुम छेड़ो बंसी की तान और
झूमती आऊँ मै

चाह नही कि..
तुम बैठो कदम्ब की डाल और
नाच के रिझाऊँ मै

चाह नही कि..
थामूं तुम्हारा हाथ और
निहारूँ तुम्हारी आँखों में


चाह बस इतनी कि..
हे ! नाथ
छू लूँ तुम्हारे
पद पंकज और
हाथ हो तुम्हारा मेरे सिर पर ||

मीना पाठक