Monday, September 30, 2013

जीवन के रेगिस्तान में
















जाने कितने बसंत
शीत,पतझड़, सावन
आये गये
तपती,भीगती,ठिठुरती
मुरझाती पर फिर भी
चलती रही अनवरत
हाँफती,दौड़ती,पसीजती
डोर अपनी साँसों की पकड़े
कोलाहल अंतर का समेटे
मूक, निःशब्द बस्
अपने काफिले के साथ
बढ़ती ही गई जीवन के पथ पर !!

अपनी साँसें संयत करने को
रुकी इक पल को
पीछे मुड़ कर देखा जो
छोड़ गये थे सभी मुझको
मेरे पीछे था अब सुनसान
आगे वियावान
नीचे तपती रेत
ऊपर सुलगता आसमान
बीच में झुलसती मैं
अकेली जीवन के रेगिस्तान में ||
  *****

Thursday, September 26, 2013

माँ तुम्हारा कर्ज चुकाना है

















नौ महीने
अपनी कोख में सम्भाला
पीड़ा सहकर
लायी मुझे दुनिया में
जानती हूँ
बहुत दुःख सह, ताने सुन
जन्म दिया मुझे

मैंने सुना था, माँ!
जब बाबा ने तुम्हें धमकाया था
कोख में ही मारने का
दबाव बनाया था
दादी ने क्या-क्या नही सुनाया!
पर तुम!
न डरी, न झुकी
मुझे जन्म दिया

हमारे होते भी
तुम निपूतनी कहलाई
पर तुम्हारे
प्यार में कमी न आई

तुम्हारे आँसुओं का
मोल चुकाना है
बेटी के जन्म से
झुका तुम्हारा सिर
गर्व से उठाना है
माँ! तुम्हारा कर्ज चुकाना है ||

मीना पाठक
चित्र -- साभार गूगल 

Friday, September 20, 2013

कराहती ज़िंदगी













रात के अँधेरे में कराहती हुई सुलोचना करवटें बदल रही थी | शरीर का कोई भी हिस्सा ऐसा नही था जहाँ चोट से काला निशान ना पड़ा हो जिस करवट भी सोती दर्द से कराह उठती थोड़ी देर बाद उठ के बैठ गयी और सोचने लगी "आखिर कब तक सहती रहूंगी ये सब प्रताड़नायें, झूठे आरोप, अब तो हद हो गयी है बर्दास्त के बाहर हैं मेरे, नहीं होता ये सब सहन अब, तो क्या करूं कहाँ जाऊँ, मायके से विदा होते समय यही तो कहा था माँ ने कि अब वो ही तुम्हारा घर है, यहाँ से डोली में जा रही हो वहाँ से अर्थी पर निकलना |" सुलोचना के सामने अंधेरा ही अंधेरा था,कहाँ जाए, बहार भी तो भेड़ियों का झुण्ड है, आत्महत्या कर सकूँ इतनी भी हिम्मत भगवान् ने नही दी मुझे, तो कहाँ जाऊं | कुछ समझ में नहीं आ रहा था और अब इस इंसान के साथ जीना मुश्किल था जो उसे इंसान नही जानवर समझता था |अचानक कुछ सोचते हुए उसकी आँखे चमक उठी और वो जोर जोर से हँसने लगी, अपने बाल नोचने लगी, अपना सिर दीवार पर जोर-जोर से मारने लगी | शोर सुन के घर के सभी लोग उसके कमरे में आ गए | जो सुलोचना सब कुछ चुपचाप सह लेती थी और बंद कमरे में आंसू बहाती थी उसी सुलोचना का ये रूप देख कर सभी दंग थे |
दो दिन बाद ही सुलोचना के दरवाजे पर एक एम्बुलेंस आ कर खड़ी हो गयी, उसमे से कुछ लोग उतर कर सुलोचना के कमरे की तरफ बढ़ गए | एम्बुलेंस पर लिखा था "मानसिक रूप से बिक्षिप्त रोगियों के लिए |"
|मीना पाठक|

Friday, September 13, 2013

हिन्दी हमारी मातृभाषा







हिन्दी हमारी मातृभाषा
हिन्दी हमारा मान है
हिन्दी से हम हिंदी हैं
देश हिन्दोस्तान है
भूल बैठे फिर क्यूँ हिन्दी हम
अंग्रेजी अपनाया है ...
इकदूजे से बोलचाल का
माध्यम उसे बनाया है
अंग्रेजों की अंग्रेजी अब भी
हम पर हावी है
अपनी हिन्दी को हमने
ही कहा बेचारी है
चलो उठो संकल्प करो
हिन्दी में लिखना पढना है
हिन्दी का गौरव सम्मान
बाइज्जत वापिस करना है
अपने नौनिहालों को हिन्दी
का पाठ पढ़ाएंगे
हिन्दी हमारी मातृभाषा है
ये घूटी पिलायेंगे
वही बड़े हो कर कल
हिन्दी का मान बढ़ाएंगे
हिन्दी का खोया सम्मान
उसे वापिस दिलाएंगे ||

हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !! 

||मीना पाठक||

चित्र -- गूगल