Wednesday, June 24, 2020

इस भयावह समय में एक सकारात्मक टिप्पणी



हममें से किसी ने भी कभी कल्पना नहीं कि होगी कि अपने जीवन में ऐसी परिस्थिति से सामना करना पड़ेगा। बचपन में सुना करती थी कि एक बार हैजा महामारी के रूप में कभी फैला था
, जो पूरा गांव का गांव लील लेता था। प्लेग ने न जाने कितनों की जीवन लीला समाप्त कर दिया था। पर हमें यह कभी नहीं लगा कि हमें भी किसी महामारी से दो-चार होना पड़ेगा। जिस समय यह महामारी चीन के वुहान में चरम पर थी उस समय भी हमने सोचा कि हमे क्या! कौन सी हमारे पास आ रही ये महामारी! हमें लगा कि हम तो पूरी तरह सुरक्षित हैं। पर हवाई जहाज में बैठकर यह हम तक पहुंच ही गई और ऐसी पहुंची कि अर्थव्यवस्था की नींव हिल गई। चारों तरफ त्राहिमाम है। इस समय सारा देश/दुनिया अपने अपने घरों में डरकर दुबका है। हर तरफ भयावह सन्नाटा पसरा है। हर एक के चेहरे पर एक अंजाना सा भय व्याप्त है। एक साधारण छींक आने पर प्राण हलक में अटक जा रहा है। अपने घर में रहकर भी दिन में बार-बार हाथ धोने से हाथ रूखे हो गए हैं। इस महामारी ने बड़े-छोटे, अमीर-गरीब किसी में भेद-भाव नहीं किया। सबके दिन का चैन और रातों की नींद उड़ चुकी है। दुकान, बाजार,कारखाने, यातायात सब ठप्प! किसने ऐसे दिनों की कल्पना की थी!जाहिर है, किसीने भी नहीं। क्योंकि किसी को भी अपने से फुरसत कहां थी! सभी जी रहे थे अपने ढंग से। पैसों के पीछे भागते हुए सभी अपने अपने सुखद भविष्य की योजना में व्यस्त थे पर कहते हैं ना कि सब अपना सोचा नहीं होता! प्रकृति ने मनुष्य पर ऐसा लगाम लगाया कि जो जहां था वही रुक गया। अब सबकी एक ही समस्या! एक ही दुःख! सबके सोचने समझने की एक ही दशा और दिशा है! सब की एक ही चिंता। सब की एक ही प्रार्थना कि जल्दी से जल्दी इस महामारी से मुक्ति मिले।
इस महामारी ने दुनिया भर को आईना भी दिख दिया है कि कोई भी बड़ा छोटा नही है। चाहे कोई महाशक्ति हो या सामान्य! कोई भी इस आपदा से निपटने में सक्षम नहीं है। यह त्रासदी बहुत कुछ कह भी रही है। हम अपनी इस भागदौड़ की जिंदगी में थोड़ा सा भी ठहरने के लिए तैयार नहीं थे। किसी को भी समय नहीं था कि अपने ही बुजुर्गों से दो पल उनका हाल पूछ लें। उनसे और उनकी दी हुई सीखों से दूर हो गए थे हम। आज हमें डब्लू एच ओ हाथ धोना सिखा रहा है। जब हमारे बुजुर्गों ने सिखाया तब हमने उनकी सीख को उपहास में उड़ा दिया। हमारे यहां जूते चप्पल घर में लाने की मनाही थी। रसोई में तो बिल्कुल भी नहीं। भोजन करने से पहले चौका दिया जाता था फिर वहां बैठकर भोजन किया जाता था। अंगोछे का प्रयोग होता था। कहीं भी बाहर से आकर हाथ पैर मुंह धोने की प्रथा थी। हजामत बनवा कर स्नान करने का विधान था। जो आज की पीढ़ी बिल्कुल भूल चुकी थी या उसके पास इतना समय ही नहीं था। इस महामारी ने वह सब सिखा दिया। 
एक सबसे बड़ी बात जो मुझे याद आ रही है। बचपन में जब मैं रुपए-पैसे छूती तब नानी जी साबुन से मेरा हाथ धुलाती थीं। कहतीं कि "न जाने किस-किस ने कैसे-कैसे हाथ से इसे छुआ होगा इसलिए इन्हें छूने के बाद हाथ अवश्य धोना चहिये।" आज जब रुपए पर थूकते देख रही हूं तब नानी जी की दी हुई सीख याद आ रही है। डब्ल्यू.एच.. या आयुष मंत्रालय हमें वही सिखा रहा है जो हमारे बुजुर्ग सिखाते आए हैं। बस हमने उनकी बातों को नजरअंदाज किया। पर आज सब उन्हीं सीखों को अपने जीवन का हिस्सा बना रहे हैं। इस महामारी ने  हमें हमारी जड़ों की ओर लौटने को मजबूर कर दिया है। 
आज लगभग सभी घरों में तीन पीढ़ियां एक साथ बंद हैं। महामारी ही सही, घर के बुजुर्गों से चेहरे खिल उठे हैं। इसी महामारी के चलते घर वापसी हुई है। गांव के गांव खाली हो गए थे। सभी रोटी-रोजगार के लिए शहर की ओर भागे थे। खेती किसानी करने वाले हाथ शहरों में मजदूरी करने लगे थे। आज भारी संख्या में यही दिहाड़ी मजदूर शहरों से पैदल ही अपने गांव पहुंच गये हैं। भले ही सुरक्षा कारणों से पंद्रह दिनों के लिए उन्हें गांव से बाहर रखा गया है। पर इन पंद्रह दिनों के बाद गांव के गांव आबाद होंगे। घरों के बन्द दरवाजे खुलेंगे हर देहरी पर दीया जलेगा। खेत-खेत हरियल और द्वार-द्वार अन्न का ढेर होगा। 
कारण कुछ भी हो। गाँव बस गए हैं। उन अपनों से जो रोटी की तलाश में गाँव छोड़ शहरों के हो गए थे, अब वही रोटी इन्हें अपने गाँव खींच लाई है। हां, अर्थव्यवस्था चरमराई है। ढेरों दुश्वारियां मुँह बाए खड़ी हैं।पर हमें हर परिस्थिति में जीना आता है। हम इस परिस्थिति से भी उबर जाएंगे और अपनी ढेर सारी गलत आदतों से छुटकारा भी पा लेंगे। हमें उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है कि हम इस कठिन परिस्थिति से बाहर निकल आएँगे। अंधकार कितना भी गहरा हो, सूरज को निकलने से रोक नहीं पाता। 
मीना पाठक

[22अप्रैल 2020को दस्तक प्रभात में प्रकाशित ]

नोट-- नाम सम्पादक ने अपने हिसाब से बदल कर छापा|मैंने जो नाम दिया उसी नाम से पोस्ट कर रही हूँ |

Wednesday, June 3, 2020

दोहे













भोर हुयी दिनकर उठे, खिले कुसुम हर ओर|
फूटी आशा की किरण, नाचा मन का मोर ||

मन का स्वामी चन्द्रमा, भौंराए नित गोल|
क्यों ना बहके मन मेरा, पंछी करे किलोल ||

मीना पाठक

(चित्र-साभार गूगल)