Friday, December 26, 2014

स्त्री !

बसंती हवा  
गुलाबी शरद
गुनगुनी धूप सी,
शीतल जल 
पवन में सुगंध
कोयल के कूक सी,
कमलदल
सतरंगी रश्मियां 
शशि किरन सी,
बौराई भँवर
कल-कल सरिता
अटल  शिखर सी,
ऊर्वशी
शकुंतला
यशोधरा सी, 
स्त्री !!
जननी, तरणी,
संरक्षणी
सम्पूर्ण प्रकृति की संचालिनी
फिर भी !!
अबला, उपेक्षिता,
तिरष्कृता,
पराश्रिता सी
क्यूँ ??